Wednesday, January 18, 2017

सीखना ( LEARNING )

सीखना "एक जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम प्रत्येक दिन किसी से भी,कुछ न कुछ सीखते रहते हैं।चूंकि हम छोटे बच्चों की शिक्षा कार्य से सम्बद्ध है इसलिए आज के विषय पर प्राथमिक स्तर के बच्चों के परिप्रेक्ष्य में ही चर्चा करते हैं-
"सीखने की क्षमता का विकास कैसे हो ?"......बालक जब प्रथम बार विद्यालय में कदम रखता है तो उसके साथ उसकी स्फूर्ति से भरी सभी इन्द्रियाँ जिनमें सीखने की अपार संभावनाएँ भरी होती हैं ।सीखने की क्षमता के विकास को निम्न रूप में चरण बद्ध किया जा सकता है -
👉 सुनना सीखने की क्षमता का विकास -बालक ककी सुनने की क्षमता का विकास उसके जन्म से ही प्रारंभ हो जाता है।विद्यालयी स्तर पर सीखने की क्षमता के विकास का प्रारंभ विभिन्न पाठ्यक्रमीय छोटी छोटी कहानियों,कविताओं उसके बाद वर्णो के उच्चारणों को सुनाकर किया जाये।
👉बोलना सीखने की क्षमता का विकास- द्वितीय चरण में बच्चों के बोलना सीखने की क्षमता के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाए।छोटे बालक से,आप का नाम क्या है?,आप के घर में और कौन कौन है?,विद्यालय आ रहे थे तो रास्ते में क्या देखा?आज क्या खाना खाया? आदि प्रश्नों को करके उसकी बोलने की क्षमता के विकास की प्रक्रिया शुरू की जाये।
👉 समझ के साथ पढ़ने की क्षमता का विकास -जब बालक सुनना व बोलना सीख जाये तभी उएसकी पढना सीखने की क्षमता पर ध्यान केन्द्रित किया जाये।एक प्रशिक्षण में मैंने सीखा था कि पढना सीखने के लिये कौशल आधारित प्रणाली व समॻ भाषा प्रणाली दोनों प्रणालियों के संतुलित उपयोग करने से पठन की क्षमता का विकास बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
👉लेखन क्षमता का विकास -बालक की लेखन क्षमता के विकास का कार्य बहुत ही सरल व रुचिकर वातावरण सृजित कर किया जाए।सर्वप्रथम उसे विभिन्न गगतिविधियों द्वारा हाथ और उंगलियों को चलाने का अभ्यास कराया जाए तत्पश्चात आड़े तिरछी रेखाएँ व गोल आकृतियाँ बनबाकर उसके द्वारा ही बनायी गयी आकृतियों से मानक अक्षरों को बनाकर व दिखाकर उसकी लेखन क्षमता का विकास किया जाये।
जब बालक उपरोक्त उल्लिखित प्रारंभिक स्तर की दक्षताओं को ॻहण कर लेगा तो उसके अन्दर स्वतः निरन्तर सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी।
कोई विषय वस्तु स्वतः ही बालक के स्मृति पटल पर अंकित हो जाये इसके लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं-
👉विषय वस्तु की भाषा बालक के बौद्धिक स्तर के अनुरूप हो।
👉 विषय वस्तु को बालकों से संबंधित किसी घटना अथवा किसी अन्य चर्चित घटना से जोड़कर।
👉 विषय वस्तु की मानक भाषा को बालकों की परिवेशीय व स्थानीय भाषा सेजोड़कर ।
👉 विषय वस्तु से बालकों को जोड़ने के लिये रुचिकर व आनंददायी समृद्ध वातावरण सृजित करके।
👉 विभिन्न गतिविधियों व अधिक से अधिक शिक्षण अधिगम सामग्रियों के प्रयोग करके।
👉 विषय वस्तु में आये कठिन शब्दों आदि के निवारण विषय वस्तु के प्रस्तुत करते समय ही किये जाएं।
👉 डीकोडिंग व धाराप्रवाहिता का उचित ध्यान रखकर।
स्मरण शक्ति के विकास के लिये भावात्मक स्थिरता नितांत आवश्यक है।कोई भी भावपूर्ण घटना यदि एक बार हमारे स्मृति पटल पर अंकित हो जाये तो वह स्थायी हो जाती है।जब हम कोई फिल्म देखते हैं तो उसमें निहित भावों को हम अपने मनोभावों से जोड़ लेते हैं तभी उसके समस्त पात्रों व कथानक का अंकन हमारे स्मृति पटल पर स्थिर हो जाता है।प्राथमिक स्तर के बच्चों में भावों की स्थिरता से स्मरण शक्ति के विकास की संभावनाएं और अधिक प्रबल हो जाती हैं।अत: यह सिद्ध होता है कि स्मरण शक्ति के विकास के लिये भावात्मक स्थिरता नितांत आवश्यक है।
                                       -रजनीश द्विवेदी

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