Monday, January 30, 2017

कक्षा १ व २ में शिक्षण कैसे करें

अक्सर यह देखा जा सकता है कि  सरकारी स्कूलों में  कक्षा १ व २ को एक साथ बैठाया जाता है।जबकि वास्तव में  इन दोनों कक्षाओं के बच्चों को अलग-अलग बैठाना चाहिए। एक साथ बैठाने से पहली कक्षा के बच्चों  के सीखने के स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।साथ साथ बैठाने से  उनके आत्मविश्वास पर भी असर पड़ता है क्योंकि दूसरी कक्षा के बच्चे पहली कक्षा के बच्चों की तुलना में मानसिक रूप से ज्यादा परिपक्व हो चुके होते हैं।तथा उनका आत्मविश्वास भी अधिक मुखर रहता है।ऐसी स्थिति में कक्षा १ के बच्चे जोकि अभी अपनी समझ मजबूत करने की कोशिश में हैं उनको कम प्रयास करने का अवसर प्राप्त होता है। इसके साथ  साथ अध्यापक कक्षा १ के प्रत्येक बच्चे तक नहीं पहुंच पाते, जो इस स्तर के बच्चों के लिए बहुत ही आवश्यक होता है।कक्षा १ व २ के बच्चों को हिंदी भाषा को समझ के साथ  पढ़ना-लिखना सिखाने हेतु हम क्या कर सकते है इस तथ्य पर विचार करते हैं।
🎄  कक्षा १ व २ को एक साथ शिक्षण करने के बजाय  कक्षा १ के बच्चो को अलग कक्षा लगाकर शिक्षण कार्य करना चाहिए ।इस तरह शिक्षण कार्य करने से शिक्षक पहली बार स्कूल आने वाले बच्चों के ऊपर अधिक से अधिक ध्यानकर्षण रख पायेगा।इस तरह शिक्षक प्रत्येक बालक की सीखने की क्षमता व स्थिति की सही सूचना प्राप्त कर सकता है।इसके अलावा अधिगम में बच्चे को किस तरह की कमजोरी महसूस हो रही है यह भी मालूम होता रहेगा।
🎄अक्षर सिखाने के लिये पहले सश्वर वाचन बहुत आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के प्रयोग कर सकते हैं जैसे बच्चों को ऐसी कविताएँ सुनायी जाये जिन कविताओं में अमात्रिक शब्दों की पुनरावृत्ति हो।उदाहरण के लिए "सर सर सर सर उड़ी पतंग।फर फर फर फर उड़ी पतंग।"कविताएँ बच्चों को अधिक आकर्षित करती हैं इन्हें कंठस्थ कर लेने के बाद इनमें प्रयोग अक्षरों की संकल्पना व संरचना के बारे में सिखाया जा सकता है।
🎄प्रायः यह देखा जाता है कि छात्र  वर्ण आसानी से सीख जाते हैं परनतु उनको मात्राओं को पहचानने और वर्णों के साथ मात्रा लगाकर पढ़ने में विशेष कठिनाई परिलक्षित होती है मात्रा सिखाते समय यह ध्यान रखना नितान्त आवश्यक है कि बच्चो को पहले हमें प्रतीक बताना चाहिए, फिर उसकी आवाज़ (साउण्ड)के बारे में परिचय कराना चहिए तत्पश्चात वर्णों के साथ मात्राओं का उपयोग कैसे करना है बच्चों को इसके बारे में परिचय कराना चाहिए। और उसके अभ्यास का पर्याप्त अवसर बच्चों को देना चाहिए। ताकि वे अपनी समझ को मजबूत बना सकें। इसके बाद वर्णों के क्रम से किसी वर्ण विशेष में बाकी वर्णों को जोड़कर नए शब्द बनाकर वर्णों की पुनरावृत्ति का और उन शब्दों में मात्राओं का उपयोग करके मात्राओं के अभ्यास को बच्चों को अवश्य करवाया जाना चाहिए।
🎄उपरोक्त अभ्यास लगातार होना चाहिए ताकि बच्चों का इतना अभ्यास हो जाए कि वर्ण के साथ मात्रा के प्रतीक को देखते ही वे झट से अनुमान लगा लें कि इसको कैसे बोला जाएगा।समझकर पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में उनके पढ़ने की गति (रीडिंग स्पीड) कम होती है।ऐसे बच्चे डिकोडिंग में अपनी काफी सारी ऊर्जा लगा देते हैं, इसलिए उनके  समझकर पढ़ने की दिशा में होने वाली प्रगति  कम होती है। वही दूसरी तरफ सहज प्रवाह से किसी वाक्य या गद्यांश को पढ़ने वाले बच्चे उसे सहजता से समझते हैं,व धीरे-धीरे वे खुद से बिना किसी सहायता के ऐसा करने लगते हैं यानी समझकर पढ़ने लगते हैं।
🎄मात्राओं को सिखाने के लिये बारहखड़ी का प्रयोग बहुत ही प्रभावी सिद्ध होता है।बारहखड़ी सीखने से बालक प्रत्येक अक्षर में मात्रा लगा देने पर उसके उच्चारण के परिवर्तन को तो सीखता ही है साथ ही साथ शब्द भी बनाने व पढ़ने लगता है।

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