Tuesday, January 17, 2017

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार कैसे हो ?

उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है।परन्तु वर्तमान समय में कतिपय कारणों से साधनों व संसाधनों की अधिकता होने के बावजूद भी गुणवत्ता परक शिक्षा का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है।विद्यालय के बच्चों में जिन प्राथमिक दक्षताओं की अपेक्षा की जाती है उनका विकास अवरुद्ध हो चुका है।ऐसे माहौल में कार्यरत शिक्षकों की शिक्षण कार्यशैली व नवीन शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में,बेसिक शिक्षा अध्यापन सुधारों में निम्न तत्वों का समावेश किया जा सकता है -
1-प्रशासनिक परीक्षा की तर्ज़ पर चयन परीक्षा-शिक्षक चयन हेतु प्रशासनिक परीक्षा की तर्ज़ पर तीन चरणों में परीक्षण किया जाए,सामान्य,मुख्य व साक्षात्कार।मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया में बहुत से अयोग्य शिक्षकों का चयन होता चला आ रहा है।कुछ कम मेरिट वाला योग्य प्रतिभागी ज्यादामेरिट वाले अयोग्य प्रतिभागी से पीछे होकर चयन प्रक्रिया से बाहर हो जाता है।सामान्य परीक्षा द्वारा ही योग्य शिक्षकों का चयन संभव है।
2-बेसिक शिक्षा क्षेत्र में रचनात्मकता व सक्रियता का मूल्यांकन-शिक्षक चयन प्रक्रिया के दूसरे चरण में प्रमुख रुप से यह मूल्यांकन किया जाए कि प्रतियोगी में बेसिक शिक्षा के प्रति कितनी सक्रियता व रचनात्मकता का समावेश है।एक सफल शिक्षक अपनी रचनात्मकता और नवाचार सृजन से ही बच्चों से बेहतर तरीके से जुड़ाव कर सकता है।अत: इस पक्ष का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बेसिक शिक्षा से जुड़ने जा रहा व्यक्ति क्या बच्चों से अपना सामान्जस्य बैठा भी पायेगा अथवा नहीं ।
3-शिक्षण प्रणाली व अभिव्यक्ति कौशल का मूल्यांकन-अंतिम परीक्षण अर्थात साक्षात्कार में प्रतियोगी की शिक्षण पद्धतियों व अभिव्यक्ति कौशल को मुख्य आधार बनाया जाए क्योंकि यह दोनों ही पक्ष इस क्षेत्र में अहम भूमिका रखते हैं।
4-चयन परीक्षा संम्पन्न कराने हेतु कठोर नियम-पूर्व में शिक्षक चयन बीटीसी प्रशिक्षण परीक्षा द्वारा ही किया जाता था लेकिन कुछ भ्रष्ट तन्त्र द्वारा उक्त परीक्षा की शुचिता को नष्ट कर भ्रष्टाचार व धन उगाही का जरिया बना डाला गया।इसलिए चयन परीक्षा संम्पन्न कराने हेतु कठोर नियमों का समावेश किया जाए।शीर्ष स्तर से नीचे तक सभी जिम्मेदार व्यक्ति की जबावदेही निश्चित की जाये व किसी भी अनियमितता के लिये कठोरतम् दण्ड का प्रावधान किया जाए।
5-गृह जनपद में तैनाती- चयन प्रक्रिया व परीक्षा प्रदेश स्तर पर ही हो परन्तु नियुक्ति गृह जनपद में ही दी जाए तो शिक्षक पूर्ण मनोयोग से शिक्षण कार्य में संलग्न होगा।
इन तत्वों के अलावा दूसरे प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में मेरा यह मानना है कि दूसरे जनपद में कार्यरत होने के कारण बच्चों के साथ अन्याय अनुचित होने के साथ साथ बहुत बड़ा पाप है साथ ही देश के साथ गद्दारी भी क्योंकि देश के भीतर जो भी उन्नति होती है उस के असल हकदार दो ही तत्व हैं।पहला देश का नागरिक और दूसरा प्रशासन।इन दोनों ही तत्वों के मूल में देश के बच्चे ही हैं।शायद इसलिए ही बच्चों को देश का कर्णधार व भविष्य कहा जाता है।यदि किसी भी रूप में इनके साथ अन्याय किया तो निश्चित ही यह हमारे ईश्वर का अपमान होगा,बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं यह सभी जानते हैं।ईश्वर ने हमें हमारे 62 वर्षों तक के लिये शिक्षण कार्य का दायित्व सौंपा है तो हम मात्र 1 वर्ष ही क्यों मन लगा कर कार्य करें??
आइए ये शपथ ली जाए कि इस महान कार्य हेतु पूर्ण मनोयोग से लगे रहेंगे।एक बार मन लगा दीजिये फिर दोबारा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी ......क्योंकि एक बार मन लगने से ही मन मस्त मगन हो जायेगा इन नन्हे भगवान स्वरूपों में ..........धन्यवाद।

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