Monday, January 30, 2017

कक्षा १ व २ में शिक्षण कैसे करें

अक्सर यह देखा जा सकता है कि  सरकारी स्कूलों में  कक्षा १ व २ को एक साथ बैठाया जाता है।जबकि वास्तव में  इन दोनों कक्षाओं के बच्चों को अलग-अलग बैठाना चाहिए। एक साथ बैठाने से पहली कक्षा के बच्चों  के सीखने के स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।साथ साथ बैठाने से  उनके आत्मविश्वास पर भी असर पड़ता है क्योंकि दूसरी कक्षा के बच्चे पहली कक्षा के बच्चों की तुलना में मानसिक रूप से ज्यादा परिपक्व हो चुके होते हैं।तथा उनका आत्मविश्वास भी अधिक मुखर रहता है।ऐसी स्थिति में कक्षा १ के बच्चे जोकि अभी अपनी समझ मजबूत करने की कोशिश में हैं उनको कम प्रयास करने का अवसर प्राप्त होता है। इसके साथ  साथ अध्यापक कक्षा १ के प्रत्येक बच्चे तक नहीं पहुंच पाते, जो इस स्तर के बच्चों के लिए बहुत ही आवश्यक होता है।कक्षा १ व २ के बच्चों को हिंदी भाषा को समझ के साथ  पढ़ना-लिखना सिखाने हेतु हम क्या कर सकते है इस तथ्य पर विचार करते हैं।
🎄  कक्षा १ व २ को एक साथ शिक्षण करने के बजाय  कक्षा १ के बच्चो को अलग कक्षा लगाकर शिक्षण कार्य करना चाहिए ।इस तरह शिक्षण कार्य करने से शिक्षक पहली बार स्कूल आने वाले बच्चों के ऊपर अधिक से अधिक ध्यानकर्षण रख पायेगा।इस तरह शिक्षक प्रत्येक बालक की सीखने की क्षमता व स्थिति की सही सूचना प्राप्त कर सकता है।इसके अलावा अधिगम में बच्चे को किस तरह की कमजोरी महसूस हो रही है यह भी मालूम होता रहेगा।
🎄अक्षर सिखाने के लिये पहले सश्वर वाचन बहुत आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के प्रयोग कर सकते हैं जैसे बच्चों को ऐसी कविताएँ सुनायी जाये जिन कविताओं में अमात्रिक शब्दों की पुनरावृत्ति हो।उदाहरण के लिए "सर सर सर सर उड़ी पतंग।फर फर फर फर उड़ी पतंग।"कविताएँ बच्चों को अधिक आकर्षित करती हैं इन्हें कंठस्थ कर लेने के बाद इनमें प्रयोग अक्षरों की संकल्पना व संरचना के बारे में सिखाया जा सकता है।
🎄प्रायः यह देखा जाता है कि छात्र  वर्ण आसानी से सीख जाते हैं परनतु उनको मात्राओं को पहचानने और वर्णों के साथ मात्रा लगाकर पढ़ने में विशेष कठिनाई परिलक्षित होती है मात्रा सिखाते समय यह ध्यान रखना नितान्त आवश्यक है कि बच्चो को पहले हमें प्रतीक बताना चाहिए, फिर उसकी आवाज़ (साउण्ड)के बारे में परिचय कराना चहिए तत्पश्चात वर्णों के साथ मात्राओं का उपयोग कैसे करना है बच्चों को इसके बारे में परिचय कराना चाहिए। और उसके अभ्यास का पर्याप्त अवसर बच्चों को देना चाहिए। ताकि वे अपनी समझ को मजबूत बना सकें। इसके बाद वर्णों के क्रम से किसी वर्ण विशेष में बाकी वर्णों को जोड़कर नए शब्द बनाकर वर्णों की पुनरावृत्ति का और उन शब्दों में मात्राओं का उपयोग करके मात्राओं के अभ्यास को बच्चों को अवश्य करवाया जाना चाहिए।
🎄उपरोक्त अभ्यास लगातार होना चाहिए ताकि बच्चों का इतना अभ्यास हो जाए कि वर्ण के साथ मात्रा के प्रतीक को देखते ही वे झट से अनुमान लगा लें कि इसको कैसे बोला जाएगा।समझकर पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में उनके पढ़ने की गति (रीडिंग स्पीड) कम होती है।ऐसे बच्चे डिकोडिंग में अपनी काफी सारी ऊर्जा लगा देते हैं, इसलिए उनके  समझकर पढ़ने की दिशा में होने वाली प्रगति  कम होती है। वही दूसरी तरफ सहज प्रवाह से किसी वाक्य या गद्यांश को पढ़ने वाले बच्चे उसे सहजता से समझते हैं,व धीरे-धीरे वे खुद से बिना किसी सहायता के ऐसा करने लगते हैं यानी समझकर पढ़ने लगते हैं।
🎄मात्राओं को सिखाने के लिये बारहखड़ी का प्रयोग बहुत ही प्रभावी सिद्ध होता है।बारहखड़ी सीखने से बालक प्रत्येक अक्षर में मात्रा लगा देने पर उसके उच्चारण के परिवर्तन को तो सीखता ही है साथ ही साथ शब्द भी बनाने व पढ़ने लगता है।

Friday, January 27, 2017

शून्य की अवधारणा सिखाने की गतिविधि

गणित सीखना किसी भाषा को सीखने की तरह है। जिस तरह बचपन में हम हिंदी या अपनी क्षेत्रीय भाषा को सीखते हैं, उसी तरह गणित को भी धीरे धीरे सीखा जाता है। पहले हम नंबर के बारे में जानते हैं, फिर उनका जोड़, घटाव, गुना, भाग फिर धीरे धीरे हम स्टेप बाई स्टेप आगे सीखते चले जाते हैं। कुछ बच्चों को गणित मुश्किल इसलिए लगता है कि वो इस विषय को रटने लगते हैं। गणित रटा नहीं जाता है बल्कि सीखा जाता है। बचपन में जब आप हिंदी सीख रहे थे तो क्या मम्मी, पापा, दादा, दादी रटे थे, या किसी वाक्य को रट लिए थे। जैसे कि मुझे खाना चाहिए। जब भी भूख लगे तो ये वाक्य बोलना है। नहीं, हमने सीखा था, हम इस वाक्य को कई तरीके से बोल सकते हैं। इसी तरह गणित को भी सीखने की कोशिश करिये, रटने की नहीं। पुरे गणित में कोई भी सूत्र (फार्मूला) रटना नहीं है बल्कि ये जानना है की ये सूत्र कहाँ से आया। तब हम धीरे धीरे सीखते चले जाएंगे। और गणित में मजा आने लगेगा। और सबसे इम्पोर्टेन्ट बात ये है कि इसमें वक्त लगता है। जिस तरह हिंदी सिखने में हमें कई साल लग गए थे उसी तरह गणित , हर दिन कुछ नया सीखिये। वक्त लगेगा, लेकिन एक बार आपको मजा आने लग गया तो, ……
१.अपने सभी दोस्तों को एक-एक खाली पर्ची दीजिये। अपने लिए भी एक पर्ची रखिये। हर एक को (बिना दूसरों को दिखाए) अपनी पर्ची पर एक नंबर लिखना है; कितना भी बड़ा या छोटा। इसी प्रकार अपनी पर्ची पर भी आप एक नंबर लिखिए।
२. अब हर किसी को (आपको भी) अपनी पर्ची को बंद करके एक कटोरी में डालना है।
३. अब आप ये दावा करें कि आप एक भी नंबर देखे बिना सभी पर्ची पर लिखे हुए नंबरों का गुणनफल लिखेंगे।
४. एक खाली पर्ची पर सभी नंबरों के गुणनफल लिखें और जवाब दिखाए बिना उस पर्ची को बंद करके एक जगह रख दें। इस समय जवाब किसी को नहीं दिखाना है।
५. अब आप अपने मित्रों को चुनौती दें कि वे सभी नंबरों को गुणा करके जवाब की जांच करें (ऐसा करने के लिए उन्हें एक कैलकुलेटर भी दें)।
६. जब उन्हें इस सवाल का जवाब मिल जाए तो वे मिलान करने के लिए आपकी जवाब वाली पर्ची खोल सकते हैं।
रहस्य: इस जादू का जवाब हमेशा शून्य आता है, क्योंकि आपने अपनी पर्ची पर शून्य लिखा है।
कुछ दोस्त आपको मुसीबत में डालने के लिए बहुत बड़ी  संख्या वाला नंबर लिख सकते हैं। यह जादू उन्हें शून्य का एक महत्वपूर्ण गुण सिखाएगा – 'शून्य से किसी भी संख्या को गुणा करने पर हमेशा शून्य ही आता है।'
(अगर एक से अधिक बच्चों ने अपनी पर्ची पर शून्य लिखा है, तब भी इस सवाल का जवाब शून्य ही होगा, क्योंकि शून्य से शून्य को गुणा करने पर भी शून्य ही आता है।)

Saturday, January 21, 2017

नशा......एक अभिशाप!

नशा एक ऐसी लत है जो व्यक्ति को लगती तो चोरी छिपे है पर अपनी जड़ें जमा लेने के बाद उसी व्यक्ति को सभ्य समाज मे भर्तस्ना का पात्र बना देती है।नशे का लती व्यक्ति इतना असहाय हो जाता है कि सबकुछ जानते हुए भी इसको नही छोड़ पाता।आज के समय में यह बुराई युवाओं में बहुत तेजी से फैल रही है इसके अलावा बच्चों में भी यह अपनी जड़ें जमा रही है।
नशाखोरी की ओर अग्रसर होने के कारण -
⚓आज आधुनिक होने की दौड़ में कुछ बिना किसी की परवाह किए बिना बस भागे चले जा रहे हैं ,उन्हें अपने "अपनो" यहाँ तक कि अपने बच्चों तक को देखने का समय नहीं है लिहाजा बच्चे एकाकीपन से ॻसित होकर नशाखोरी की चपेट मे आ रहें हैं।
⚓नशाखोरी को फैलाने में फिल्मों ने बड़ी अहम भूमिका निभाई है ।आज कल के बच्चों के रोल माडल फिल्मी हीरो ही होते हैं......और जब रोल माडल ही कहेगा कि "चार बोतल वोदका,काम मेरा रोज का.........."तो बच्चे कैसे वोदका से अछूते रहेगें।
⚓ कमजोर कानून व्यवस्था से नशीले पदार्थ बड़ी सरलता से सभी की पहुच में हैं।कानूनी रूप से रोक होने के बावजूद भी स्कूलों और कॉलेजों के आसपास तम्बाकू गुटकों की दुकान सबसे अधिक खुली हुई हैं।
⚓ सरकार की उदासीनता भी नशाखोरी को फैलाने का एक प्रमुख कारण है ।नशीले पदार्थों के रैपरो पर अत्याधिक छोटे फांटस् मे एक चेतावनी लिखने व चित्र छापने के अलावा और कोई भी जिम्मेदारी उसकी नहीं है।
⚓ बच्चों मे नशाखोरी की प्रवृत्ति सबसे अधिक अपने घर से ही पनपती है।'डैड' तक तो ठीक था पर अब तो 'माम 'भी धुएँ के छल्ले बनाती हैं तो बच्चे तो बच्चे होते हैं।
बच्चों में नशीले पदार्थ सेवन के लक्षण-
🚬 नशीले पदार्थ सेवन करने वाले बच्चों का शरीर कमजोर,आँखें लाल और त्वचा कांति विहीन हो जाती है।
🚬ऐसे बच्चे एकाकीपन का शिकार हो जाते हैं।उन्हें एकांत में रहना अच्छा लगने लगता है।
🚬 नशीले पदार्थ सेवन करने वाले बच्चे चिड़चिड़े और हिंसात्मक प्रवृत्ति धारण कर लेते हैं ।
🚬 ऐसे बच्चे अपने शरीर के प्रति उदासीन हो जाते हैं ।शरीर की साफ सफाई से इन की अरुचि हो जाती है।
🚬 ऐसे बच्चों में एकाएक आत्मविश्वास ,यादाश्त और एकाॻता की क्षमता क्षीण हो जाती है।
🚬 बच्चों में चोरी करने ,झूठ बोलने की आदत पनपने लगती है।
🚬 नशीले पदार्थ सेवन करने वाले बच्चों के भोजन के तौर तरीकों में बदलाव, खासकर भूख ना लगना आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
क्या कदम हो हमारा यदि बच्चा नशे की चपेट में आ गया है?-
🔰इस परिप्रेक्ष्य में सर्वप्रथम यह महत्वपूर्ण है कि यदि हममें को ई व्यसन है तो पहले उसका त्याग करना चाहिए।
🔰बच्चे से संवाद स्थापित करके प्यार से उसे नशीले पदार्थ सेवन से उत्पन्न होने वाली हानियों के बारे में जानकारी देना चाहिए।
🔰 बच्चे के दिमाग को तरोताजा ककरने के लिये कहीं अच्छी मनोरंजक स्थान की यात्रा करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
🔰बच्चे को आत्मीयता से आत्मसंकल्पित करने की भावना का विकास करना चाहिए।
🔰बच्चे को एकांत में बिल्कुल भी नहीं रहने देना चाहिए।
🔰 बच्चे के मस्तिष्क को सृजनात्मक कार्य करने के प्रति मोड़ने का प्रयास करना चाहिये।
🔰उसके मस्तिष्क में नशे की संकल्पना को स्वयं के नाश के रुप में स्थापित करना चाहिए।
रजनीश द्विवेदी,प्र०अ०

Friday, January 20, 2017

वैदिक गणित से किसी भी 2 अंको का पहाड़ा कैसे तैयार करें

जगद्गुरू स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ द्वारा विरचित वैदिक गणित अंकगणितीय गणना की वैकल्पिक एवं संक्षिप्त विधियों का समूह है। इसमें १६ मूल सूत्र दिये गये हैं। वैदिक गणित गणना की ऐसी पद्धति है, जिससे जटिल अंकगणितीय गणनाएं अत्यंत ही सरल, सहज व त्वरित संभव हैं। स्वामीजी ने इसका प्रणयन बीसवीं शती के आरम्भिक दिनों में किया। स्वामीजी के कथन के अनुसार वे सूत्र, जिन पर 'वैदिक गणित' नामक उनकी कृति आधारित है, अथर्ववेद के परिशिष्ट में आते हैं। परंतु विद्वानों का कथन है कि ये सूत्र अभी तक के ज्ञात अथर्ववेद के किसी परिशिष्ट में नहीं मिलते। हो सकता है कि स्वामीजी ने ये सूत्र जिस परिशिष्ट में देखे हों वह दुर्लभ हो तथा केवल स्वामीजी के ही सज्ञान में हो। वस्तुतः आज की स्थिति में स्वामीजी की 'वैदिक गणित' नामक कृति स्वयं में एक नवीन वैदिक परिशिष्ट बन गई है।वैदिक गणित का संपूर्ण पाठ्यक्रम प्रचलित गणितीय पाठ्यक्रम की तुलना में काफी कम समय में पूर्ण किया जा सकता है।छोटी उम्र के बच्चे भी सूत्रों की सहायता से प्रश्नों को मौखिक हल कर उत्तर बता सकते हैं।
वैदिक गणित से किसी भी 2 अंको का पहाड़ा तैयार करे.
उदाहरण :--
87 का पहाड़ा
पहले 8 का पहाड़ा उसके बाजू मॆ 7 का पहाड़ा लिखें.

  8            7                    87
16         14    (16+1)    174
24         21    (24+2)    261
32         28    (32+2)    348
40         35    (40+3)    435
48         42    (48+4)    522
56         49    (56+4)    609
64         56    (64+5)    696
72         63    (72+6)    783
80         70    (80+7)    870

पहले अंक के पहाड़े मॆ दूसरे अंक के पहाड़े का प्रथम अंक जोड़े ,और दूसरे अंक के पहाड़े का दूसरा अंक हूबहू रख दें.इस प्रकार आप 10 से 99 तक का पहाड़ा बना सकते है |

Thursday, January 19, 2017

शिक्षा के क्षेत्र में संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग

By- Rajnish Dwivedi

शिक्षा एक ऐसा विषय है जो देश की दिशा और दशा दोनों का भविष्य निर्माण करता है।इसलिए शिक्षा का क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।संचार प्रौद्योगिकी से देश के शिक्षा क्षेत्र में संचार क्रांति का आगमन पहले ही हो चुका है तथा देश आज इस क्षेत्र में संचारप्रौद्योगिकी का उपयोग करने मे सफल राष्ट्र बन चुका है । संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके विद्युत शिक्षकों को 24 घण्टों के लिये एक ऐसे मंच से जोड़ा जा सकता है जहाँ से बिना किसी सीमाकंन के किसी भी क्षण अपने विचारों को प्रसारित किया जा सकता है।इसका यह प्रभाव पड़ा कि जो व्यक्ति समय अभाव अथवा अन्य किसी कारण वश अपने विचारों का प्रकटीकरण नहीं कर सकता था वह तुरंत बिना कहीं आये जाये अपने विचारों को और अधिक सुव्यवस्थित एवं ओजस्वी ढंग से प्रसारण कर पायेगा।
☀ शिक्षा से जुड़े विषयों पर समूह चर्चा द्वारा विषय के उच्चतम सार बिन्दु पर पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।समूह से जुड़े कुशल शिक्षक और प्रशिक्षक जब एक ही मंच पर एक ही विषय पर मंथन करते हैं तो विषय का सार अपने उच्चतम् स्तर को प्राप्त कर लेता है ऐसा स्वाभाविक ही है।किसी भी विषय पर उच्चस्तरीय चर्चा हेतु समूह मे संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का जो उपयोग किया है वह प्रशंसनीय व अनुकरणीय है।

☀शिक्षा जगत के अलावा अन्य विभिन्न क्षेत्रों व अलग अलग शिक्षण विधियों को एक दूसरे से परिचय करने का कार्य भी समूह द्वारा किया गया है।समूह के सदस्य अलग अलग शिक्षण विधियों पर चर्चा करते है तो स्वत: ही इन विधियों से परिचय प्राप्त हो जाता है।
☀किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के दौरान एक आभासी कक्षा कक्ष जैसा वातावरण निर्मित हो जाता है।बिना प्रशिक्षण कक्ष में जाये कुशल व योग्य प्रशिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित होने का अवसर इस समूह ने संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग से प्रदान किया है। बिना किसी समय व्यर्थ,व निवेश किये मात्र संचार माध्यम से शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये समूह ने नए आयामों का निर्माण किया है।

संचार प्रौद्योगिकी से अर्जित ज्ञान का विद्यालय स्तर पर अनुप्रयोग के दौरान निकले परिणाम :


🌑 समूह मे सम्मिलित शिक्षकों द्वारा चर्चा ककी गयी शिक्षण विधियों को विद्यालय में प्रयोग करने पर सकारात्मक परिणाम परिलक्षित हुए हैं।

🌑समूह मे प्रसारित विभिन्न गतिविधियों व शिक्षण अधिगम सामग्रियों से परिचय प्राप्त हुआ।इन गतिविधियों और शिक्षण अधिगम सामग्रियों का उपयोग विद्यालय में कर शिक्षण प्रक्रिया को रुचिकर व सरल प्रभावी बनाया जा सका है।

🌑क्षेत्रीय भाषा की कठिनाइयों से भी निजात मिल गयी क्योंकि समूह में क्षेत्रीय भाषा संबंधी चर्चा आदि होती रही है।

🌑बेसिक शिक्षा में नवाचारों की विशेष आवश्यकता है।समूह से सीखे हुए नवाचारों को विद्यालय में प्रयोग करने से विद्यालय के शैक्षिक स्तर में सुधार भी परिलक्षित है।

🌑संकेतक की संकल्पना व संकेतकों के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से विद्यालयी स्तर पर इसे बड़ी सरलता से लागू किया जा सका है।आज विद्यालय में संकेतकों द्वारा बालक की सीखने की दिशा तय करके सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन किया जा रहा है।

🌑प्रायः ऐसा होता है कि किसी भी विषय पर चर्चा करते समय नकारात्मक तथ्यों का समावेश हो जाता है और कुछ देर के लिये नकारात्मक पक्ष सबल हो जाता है जिससे कार्य करने की क्षमता व उत्सुकुता समाप्त होने लगती है परन्तु समूह में किसी भी चर्चा में नकारात्मक पक्ष सबल नहीं हो पाता है और यदि कुछ नकारात्मक तथ्य उभरते भी हैं तो उनका त्वरित उपाय भी हो जाता है जिससे कार्य करने की क्षमता और अधिक सबल व कुशल हो जाती है।इसी कुशल वसबल कार्य क्षमता का उपयोग कर विद्यालय की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार गतिमान हुए हैं।

🌑समूह द्वारा अर्जित ज्ञान को विद्यालय स्तर पर प्रयोग करने से विद्यालय की छवि के जो नकारात्मक पक्ष थे वे धीरे धीरे समापन की ओर है।समूह द्वारा अर्जित ज्ञान से शिक्षण कला को सृजनशील बनाने में बहुत अधिक सहायता प्राप्त हुई है।

🌑 बालक की मनोदशा से कैसे परिचित हुआ जाये यह ज्ञान समूह से अर्जित ज्ञान द्वारा ही संभव हो सका है।विभिन्न शिक्षण विधाओं द्वारा बालक के अन्दर सीखने के प्रति लगाव व उत्सुकता बढ़ रही है।
 अन्ततः सार यह निकलकर आ रहा है कि शिक्षा में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करने में यह समूह उच्चस्तरीय श्रेणी प्राप्त करने की ओर अग्रसर है।समूह द्वारा अर्जित ज्ञान के प्रयोग से विद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता सम्वर्धित व पल्लवित हो रही है।समूह शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सार्थक भूमिका को मजबूती के साथ स्थापित कर चुका है तथा और अधिक प्रभावी नवीन अन्वेषणों की तरफ अग्रसर है।

Wednesday, January 18, 2017

सीखना ( LEARNING )

सीखना "एक जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम प्रत्येक दिन किसी से भी,कुछ न कुछ सीखते रहते हैं।चूंकि हम छोटे बच्चों की शिक्षा कार्य से सम्बद्ध है इसलिए आज के विषय पर प्राथमिक स्तर के बच्चों के परिप्रेक्ष्य में ही चर्चा करते हैं-
"सीखने की क्षमता का विकास कैसे हो ?"......बालक जब प्रथम बार विद्यालय में कदम रखता है तो उसके साथ उसकी स्फूर्ति से भरी सभी इन्द्रियाँ जिनमें सीखने की अपार संभावनाएँ भरी होती हैं ।सीखने की क्षमता के विकास को निम्न रूप में चरण बद्ध किया जा सकता है -
👉 सुनना सीखने की क्षमता का विकास -बालक ककी सुनने की क्षमता का विकास उसके जन्म से ही प्रारंभ हो जाता है।विद्यालयी स्तर पर सीखने की क्षमता के विकास का प्रारंभ विभिन्न पाठ्यक्रमीय छोटी छोटी कहानियों,कविताओं उसके बाद वर्णो के उच्चारणों को सुनाकर किया जाये।
👉बोलना सीखने की क्षमता का विकास- द्वितीय चरण में बच्चों के बोलना सीखने की क्षमता के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाए।छोटे बालक से,आप का नाम क्या है?,आप के घर में और कौन कौन है?,विद्यालय आ रहे थे तो रास्ते में क्या देखा?आज क्या खाना खाया? आदि प्रश्नों को करके उसकी बोलने की क्षमता के विकास की प्रक्रिया शुरू की जाये।
👉 समझ के साथ पढ़ने की क्षमता का विकास -जब बालक सुनना व बोलना सीख जाये तभी उएसकी पढना सीखने की क्षमता पर ध्यान केन्द्रित किया जाये।एक प्रशिक्षण में मैंने सीखा था कि पढना सीखने के लिये कौशल आधारित प्रणाली व समॻ भाषा प्रणाली दोनों प्रणालियों के संतुलित उपयोग करने से पठन की क्षमता का विकास बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
👉लेखन क्षमता का विकास -बालक की लेखन क्षमता के विकास का कार्य बहुत ही सरल व रुचिकर वातावरण सृजित कर किया जाए।सर्वप्रथम उसे विभिन्न गगतिविधियों द्वारा हाथ और उंगलियों को चलाने का अभ्यास कराया जाए तत्पश्चात आड़े तिरछी रेखाएँ व गोल आकृतियाँ बनबाकर उसके द्वारा ही बनायी गयी आकृतियों से मानक अक्षरों को बनाकर व दिखाकर उसकी लेखन क्षमता का विकास किया जाये।
जब बालक उपरोक्त उल्लिखित प्रारंभिक स्तर की दक्षताओं को ॻहण कर लेगा तो उसके अन्दर स्वतः निरन्तर सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी।
कोई विषय वस्तु स्वतः ही बालक के स्मृति पटल पर अंकित हो जाये इसके लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं-
👉विषय वस्तु की भाषा बालक के बौद्धिक स्तर के अनुरूप हो।
👉 विषय वस्तु को बालकों से संबंधित किसी घटना अथवा किसी अन्य चर्चित घटना से जोड़कर।
👉 विषय वस्तु की मानक भाषा को बालकों की परिवेशीय व स्थानीय भाषा सेजोड़कर ।
👉 विषय वस्तु से बालकों को जोड़ने के लिये रुचिकर व आनंददायी समृद्ध वातावरण सृजित करके।
👉 विभिन्न गतिविधियों व अधिक से अधिक शिक्षण अधिगम सामग्रियों के प्रयोग करके।
👉 विषय वस्तु में आये कठिन शब्दों आदि के निवारण विषय वस्तु के प्रस्तुत करते समय ही किये जाएं।
👉 डीकोडिंग व धाराप्रवाहिता का उचित ध्यान रखकर।
स्मरण शक्ति के विकास के लिये भावात्मक स्थिरता नितांत आवश्यक है।कोई भी भावपूर्ण घटना यदि एक बार हमारे स्मृति पटल पर अंकित हो जाये तो वह स्थायी हो जाती है।जब हम कोई फिल्म देखते हैं तो उसमें निहित भावों को हम अपने मनोभावों से जोड़ लेते हैं तभी उसके समस्त पात्रों व कथानक का अंकन हमारे स्मृति पटल पर स्थिर हो जाता है।प्राथमिक स्तर के बच्चों में भावों की स्थिरता से स्मरण शक्ति के विकास की संभावनाएं और अधिक प्रबल हो जाती हैं।अत: यह सिद्ध होता है कि स्मरण शक्ति के विकास के लिये भावात्मक स्थिरता नितांत आवश्यक है।
                                       -रजनीश द्विवेदी

Tuesday, January 17, 2017

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार कैसे हो ?

उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है।परन्तु वर्तमान समय में कतिपय कारणों से साधनों व संसाधनों की अधिकता होने के बावजूद भी गुणवत्ता परक शिक्षा का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है।विद्यालय के बच्चों में जिन प्राथमिक दक्षताओं की अपेक्षा की जाती है उनका विकास अवरुद्ध हो चुका है।ऐसे माहौल में कार्यरत शिक्षकों की शिक्षण कार्यशैली व नवीन शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में,बेसिक शिक्षा अध्यापन सुधारों में निम्न तत्वों का समावेश किया जा सकता है -
1-प्रशासनिक परीक्षा की तर्ज़ पर चयन परीक्षा-शिक्षक चयन हेतु प्रशासनिक परीक्षा की तर्ज़ पर तीन चरणों में परीक्षण किया जाए,सामान्य,मुख्य व साक्षात्कार।मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया में बहुत से अयोग्य शिक्षकों का चयन होता चला आ रहा है।कुछ कम मेरिट वाला योग्य प्रतिभागी ज्यादामेरिट वाले अयोग्य प्रतिभागी से पीछे होकर चयन प्रक्रिया से बाहर हो जाता है।सामान्य परीक्षा द्वारा ही योग्य शिक्षकों का चयन संभव है।
2-बेसिक शिक्षा क्षेत्र में रचनात्मकता व सक्रियता का मूल्यांकन-शिक्षक चयन प्रक्रिया के दूसरे चरण में प्रमुख रुप से यह मूल्यांकन किया जाए कि प्रतियोगी में बेसिक शिक्षा के प्रति कितनी सक्रियता व रचनात्मकता का समावेश है।एक सफल शिक्षक अपनी रचनात्मकता और नवाचार सृजन से ही बच्चों से बेहतर तरीके से जुड़ाव कर सकता है।अत: इस पक्ष का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बेसिक शिक्षा से जुड़ने जा रहा व्यक्ति क्या बच्चों से अपना सामान्जस्य बैठा भी पायेगा अथवा नहीं ।
3-शिक्षण प्रणाली व अभिव्यक्ति कौशल का मूल्यांकन-अंतिम परीक्षण अर्थात साक्षात्कार में प्रतियोगी की शिक्षण पद्धतियों व अभिव्यक्ति कौशल को मुख्य आधार बनाया जाए क्योंकि यह दोनों ही पक्ष इस क्षेत्र में अहम भूमिका रखते हैं।
4-चयन परीक्षा संम्पन्न कराने हेतु कठोर नियम-पूर्व में शिक्षक चयन बीटीसी प्रशिक्षण परीक्षा द्वारा ही किया जाता था लेकिन कुछ भ्रष्ट तन्त्र द्वारा उक्त परीक्षा की शुचिता को नष्ट कर भ्रष्टाचार व धन उगाही का जरिया बना डाला गया।इसलिए चयन परीक्षा संम्पन्न कराने हेतु कठोर नियमों का समावेश किया जाए।शीर्ष स्तर से नीचे तक सभी जिम्मेदार व्यक्ति की जबावदेही निश्चित की जाये व किसी भी अनियमितता के लिये कठोरतम् दण्ड का प्रावधान किया जाए।
5-गृह जनपद में तैनाती- चयन प्रक्रिया व परीक्षा प्रदेश स्तर पर ही हो परन्तु नियुक्ति गृह जनपद में ही दी जाए तो शिक्षक पूर्ण मनोयोग से शिक्षण कार्य में संलग्न होगा।
इन तत्वों के अलावा दूसरे प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में मेरा यह मानना है कि दूसरे जनपद में कार्यरत होने के कारण बच्चों के साथ अन्याय अनुचित होने के साथ साथ बहुत बड़ा पाप है साथ ही देश के साथ गद्दारी भी क्योंकि देश के भीतर जो भी उन्नति होती है उस के असल हकदार दो ही तत्व हैं।पहला देश का नागरिक और दूसरा प्रशासन।इन दोनों ही तत्वों के मूल में देश के बच्चे ही हैं।शायद इसलिए ही बच्चों को देश का कर्णधार व भविष्य कहा जाता है।यदि किसी भी रूप में इनके साथ अन्याय किया तो निश्चित ही यह हमारे ईश्वर का अपमान होगा,बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं यह सभी जानते हैं।ईश्वर ने हमें हमारे 62 वर्षों तक के लिये शिक्षण कार्य का दायित्व सौंपा है तो हम मात्र 1 वर्ष ही क्यों मन लगा कर कार्य करें??
आइए ये शपथ ली जाए कि इस महान कार्य हेतु पूर्ण मनोयोग से लगे रहेंगे।एक बार मन लगा दीजिये फिर दोबारा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी ......क्योंकि एक बार मन लगने से ही मन मस्त मगन हो जायेगा इन नन्हे भगवान स्वरूपों में ..........धन्यवाद।